राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना 27 सितंबर सन् 1925 को विजयादशमी के दिन डॉ. केशव हेडगेवार द्वारा की गयी थी। इस तरह संघ 2025 में विजयादशमी को अपना सौवां स्थापना समारोह मनाएगा। संयोग से यह दिन दो अक्टूबर गांधी जयंती को पड़ेगा। जो परस्पर वैचारिक रुप से बिल्कुल अलग थे। संघ की पूरी कोशिश रहेगी कि इस दिन संघ पूरे देश के मीडिया में छा जाए क्योंकि गांधी की याद आते ही लोगों के ज़हन में गोडसे आ जाएंगे यानि गांधी के हत्यारे संघी। इसलिए सरकारी स्तर पर शायद ही इस दिन कोई कार्यक्रम हो।
इसीलिए सरसंघचालक सत्तारूढ़ प्रधानमंत्री और भाजपा पार्टी अध्यक्ष अपना बनाने के लिए बेताब हैं जो सिर्फ और सिर्फ संघ की कठपुतली बने रहे। मोदी-शाह से परस्पर काफ़ी दूरी बढ़ चुकी है। चूंकि संघ ने पचहत्तर साल वाले फार्मूला को उचित माना है जिसे स्वत: मोदी जी ने निर्मित किया है वे उसी नियम के तहत लगता है, पद से हटा दिए जाएंगे। उनकी सेवाओं को संघ उन्हें राष्ट्रपति बनाकर लेने की मंशा रखता है। इससे उनका मान भी बढ़ेगा तथा उन पर लगने वाले आरोप भी उनका कुछ बिगाड़ नहीं पाएंगे। संघ उन्हें सेफ़ कर देगा। इससे भावी पीएम और उनके बीच पनपती दूरी भी ख़त्म हो जाएगी। इसके लिए सांसदों से कोरे कागज पर हस्ताक्षर करवाने की ख़बर सामने आ रही है।
परिणामत: राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू जी से त्यागपत्र देने की चर्चाएं भी शुरू हो गई हैं। लेकिन यह इतना आसान नहीं होगा। फिर भी यदि इस प्लान पर रजामंदी होती है तो प्रधानमंत्री सरसंघचालक मोहन भागवत की पसंद का ही बनेगा। भाजपा अध्यक्ष भी संघ का होगा। अमित शाह की कोई भूमिका होगी या नहीं। इसके कोई संकेत नहीं मिले हैं। पर समझा जा रहा है कि मोदी संघ से उनके लिए बड़े पद की गुहार लगाएं। जबकि संघ अमित शाह को अभी रिटायर करने के मूड में है। यहां संघ को यह भी जानना होगा कि भाजपा इन दिनों बैसाखियों पर है तथा नायडू और नीतीश को पटाना महंगा पड़ेगा जैसा मोदी की भाजपा को पड़ रहा है। क्योंकि भाजपा और संघ एक थैली के चट्टे-बट्टे हैं।
इधर भाजपा का मूड भी खराब है वह अपने विरुद्ध काम करने वाले को बिल्कुल बर्दाश्त नहीं कर रही है जैसा कि अभी जगदीप धनखड़ के साथ हुआ। भाजपा नहीं चाहती थी कि आपरेशन सिंदूर पर कोई चर्चा हो धनखड़ ने जाने किन परिस्थितियों में आत्मा की आवाज़ पर खड़गे जी को अनुमति दे दी। वे खुलकर सवाल, हंगामे के बीच उठाते रहे। धनखड़ ने उन्हें बैठने के लिए नहीं कहा। उन्हें वे सुनते रहे। बस देर शाम उनका खेल बिगड़ गया। वे धड़ाम से गिरे और धराशाई हो गए।
ये हकीकत है इस बहाने मोदी ने आईना दिखा दिया है समस्त मंत्रियों, सांसदों को कि जो उनके विरुद्ध बोला उसका यही अंजाम होगा। इस दहशतज़दा माहौल में नीतीश और नायडू की स्थिति क्या होती है? यह विषय गंभीर हो सकता है। लेकिन फिलहाल खाली कागज़ पर सांसदों के हस्ताक्षर लेने की कथित ख़बर यदि सही है तो संभव है गुपचुप तरीके से चंद्र बाबू नायडू ,नीतीश कुमार हस्ताक्षर कर भी दें तो आश्चर्य नहीं होगा।
यदि इस तरह दबदबा बना के संघ और भाजपा मनमानी से मोदी सरकार में सितंबर में परिवर्तन लाती है तो यह हैरतअंगेज नहीं होगा। क्योंकि यह भी अंदरूनी सच है कि मोदी का विरोध बढ़ रहा है। यदि दूसरे प्रधानमंत्री सरकार बना लेते हैं तो यह सरकार भले अपना कार्य काल पूरा कर ले पर यदि इसके बाद आम चुनाव होते हैं। जिसकी संभावना कम है तो यह सरकार पुनर्वापसी नहीं कर पाएगी।
जहां तक मोदी के बाद प्रधानमंत्री का सवाल है तो ऐसा लग रहा है कि वह राहुल गांधी से टकराने के लिए पढ़ा-लिखा युवा प्रधानमंत्री को पसंद करेगी। क्योंकि मोदी के अनपढ़ होने से विदेश में छवि धूमिल हुई है। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से निकले युवाओं पर उनकी नज़र है। राज्य चुनाव में संघ ये प्रयोग कर चुका है। इसीलिए उसके नाम का खुलासा अचानक पर्ची से ही होगा।
बहरहाल, संघ दो अक्टूबर के पहले ये तमाम कवायदें पूरी करने में लगा है। ताकि संघ का झंडा आहिस्ता-आहिस्ता लाल किले तक पहुंच सके।
सारा दारोमदार अब इस बात पर टिका है कि क्या सांसद, मंत्री, राष्ट्रपति अपने ज़मीर बेचकर से ऐसा कुछ कर पाएंगे या संघ के इन उतावले कदमों पर रोक लगाने का कोई उपक्रम करने का बीड़ा उठाएंगे।
(सुसंस्कृति परिहार लेखिका और एक्टिविस्ट हैं।)